कटिहार [ बिहार ]
_बिहार की बरी विदेशी थाली तक पड़ोसता है " टेस्ट ऑफ़ इंडिया " का जायका , कटिहार के सुदूर अमदाबाद प्रखंड के भगेडीह पंचायत के बरी गांव में आजादी के पहले से ही अब तक घर -घर में बनाई जाती है कलाई दाल की बरी ,लोगो के माने तो बाजार की नहीं है कमी सरकार अगर मद्द्त करे तो बेहतरीन उद्योग साबित हो सकता है ,प्राकृतिक आपदा बाढ़ ,कटाव और दियरा में अपराध के दस्तक के बिच आर्थिक आमदनी का जरिया के साथ -साथ अपनी गांव की पहचान विदेशो तक पहुंचाता इस बरी उद्योग की कहानी बेमिसाल है ,कहते है की कभी गंगा के कटाव के कारण इस गांव के लोग भगेडीह में आ कर बस गये थे ,आजादी से पहले रोजगार के तलाश में गांव के लोगो ने दियरा की भूमि में बेहद उपजाऊ कलाई दाल के सहारे बरी बनाने की शुरुआत की थी ,ये बरी उस समय अग्रेजो को भी बेहद पसंद था ,तब से लेकर अब तक पीढ़ी दर पीढ़ी बरी निर्माण की यह दस्तूर जारी है ,स्थानीय लोग दावा तो यहां तक करते है की आज भी कई माध्यम से देश के अन्य राज्य के साथ -साथ यहां की बरी विदेशी थाली तक अपना जायका पड़ोसता , वैसे तो अब कलाई की बरी के साथ -साथ कई और भराइटी की बरी उपलब्ध है ,लेकिन आज भी लगभग 5 दर्जन घरो में कलाई की बरी निश्चित तौर पर बनती है ,बड़ी बात यह है की कोई भी सरकारी सहयोग के ही भगेडीह गांव तमाम सुविधाओं से महरूम होने के बाबजूद आत्म निर्भरता की नई इबादत लिख रही है ,वही आत्म निर्भरता की नई कहानी लिखने वाले बरी उधोग से जुडी भगेडीह गांव के कहानी पर कृषि आधारित संस्था आत्मा की अधिकारी शशि कांत झा बेहद उत्साहित है ,उन्होंने कहा की वह खुद इस गांव तक पहुंच कर सरकार स्तर पर जो भी सुविधा की जरूरत होगी उसे मुहैया करवाते हुए इस बेमिसाल बरी उधोग को और बड़ी पहचान दिलवाने की कोशिश करेंगे,तमाम सुविधाओं से संघर्ष के बाबजूद महज अपने मेहनत के बल पर बरी उधोग के सहारे भगेडीह गांव के लोगो ने अपनी आर्थिक आजादी की जो कहानी लिखी है वह बेहद तारीफे काबिल है ,
_बिहार की बरी विदेशी थाली तक पड़ोसता है " टेस्ट ऑफ़ इंडिया " का जायका , कटिहार के सुदूर अमदाबाद प्रखंड के भगेडीह पंचायत के बरी गांव में आजादी के पहले से ही अब तक घर -घर में बनाई जाती है कलाई दाल की बरी ,लोगो के माने तो बाजार की नहीं है कमी सरकार अगर मद्द्त करे तो बेहतरीन उद्योग साबित हो सकता है ,प्राकृतिक आपदा बाढ़ ,कटाव और दियरा में अपराध के दस्तक के बिच आर्थिक आमदनी का जरिया के साथ -साथ अपनी गांव की पहचान विदेशो तक पहुंचाता इस बरी उद्योग की कहानी बेमिसाल है ,कहते है की कभी गंगा के कटाव के कारण इस गांव के लोग भगेडीह में आ कर बस गये थे ,आजादी से पहले रोजगार के तलाश में गांव के लोगो ने दियरा की भूमि में बेहद उपजाऊ कलाई दाल के सहारे बरी बनाने की शुरुआत की थी ,ये बरी उस समय अग्रेजो को भी बेहद पसंद था ,तब से लेकर अब तक पीढ़ी दर पीढ़ी बरी निर्माण की यह दस्तूर जारी है ,स्थानीय लोग दावा तो यहां तक करते है की आज भी कई माध्यम से देश के अन्य राज्य के साथ -साथ यहां की बरी विदेशी थाली तक अपना जायका पड़ोसता , वैसे तो अब कलाई की बरी के साथ -साथ कई और भराइटी की बरी उपलब्ध है ,लेकिन आज भी लगभग 5 दर्जन घरो में कलाई की बरी निश्चित तौर पर बनती है ,बड़ी बात यह है की कोई भी सरकारी सहयोग के ही भगेडीह गांव तमाम सुविधाओं से महरूम होने के बाबजूद आत्म निर्भरता की नई इबादत लिख रही है ,वही आत्म निर्भरता की नई कहानी लिखने वाले बरी उधोग से जुडी भगेडीह गांव के कहानी पर कृषि आधारित संस्था आत्मा की अधिकारी शशि कांत झा बेहद उत्साहित है ,उन्होंने कहा की वह खुद इस गांव तक पहुंच कर सरकार स्तर पर जो भी सुविधा की जरूरत होगी उसे मुहैया करवाते हुए इस बेमिसाल बरी उधोग को और बड़ी पहचान दिलवाने की कोशिश करेंगे,तमाम सुविधाओं से संघर्ष के बाबजूद महज अपने मेहनत के बल पर बरी उधोग के सहारे भगेडीह गांव के लोगो ने अपनी आर्थिक आजादी की जो कहानी लिखी है वह बेहद तारीफे काबिल है ,








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