कटिहार के हापलागंज कभी मवेशी घंटी उद्योग के नाम पर था मशहूर ,आज कुछ ही घरों में रह गया है सिमटकर।
हफलागंज में बने मवेशी घंटी देश-विदेश तक होता था निर्यात।
सरकार और बैंक की बेरुखी से सिमट कर रह गया है कटिहार का मवेशी घंटी उद्योग।
कटिहार की पहचान कभी उद्योग नगरी के रूप में होती थी ,लेकिन सरकारी मदद और बैंकों से ऋण नहीं मिलने से कुटीर उद्योग भी अब बंद होने की कगार पर है।जिसके बाद अब कुटीर उद्योग चलाने वाले मजदूर मजदूरी के लिए महानगरों में पलायन को मजबूर है। हम बात उस इलाके की कर रहे हैं जो कभी मवेशी घंटी उद्योग के रूप में मशहूर था लेकिन सरकार और बैंक की बेरुखी से इस उद्योग ने दम तोड़ दिया और कुछ ही घरों में अब सिमट कर रह गया है।
कटिहार के हफलागंज की पहचान कभी मवेशी घंटी उद्योग के रूप में हुआ करती थी ,जहां घंटी की गूंज हर घरों से निकला करती थी जो यहां की पहचान थी। लेकिन अब यह उद्योग इस इलाके में कुछ घरों में ही सिमट कर रह गया है ,मवेशी घंटी निर्माण करने वाले बैजनाथ पोद्दार, रमेश पोद्दार कहते हैं कि हफलागंज में एक दर्जन से अधिक घर-में मवेशी की घंटी का निर्माण होता था ,लेकिन अब गिने-चुने दो तीन घर में ही घंटी का निर्माण हो रहा है ,और इस रोजगार को जिंदा रखे हुए हैं।उन्होंने कहा कि सरकारी मदद ना मिलना और बैंकों की बेरुखी का हवाला देते हुए कहा है कि ऋण नहीं मिलने से उद्योगों को बंद करना पड़ रहा है और दूसरे रोजगार को शुरू करना पड़ रहा है, साथ ही महानगरों में काम करने के लिए पलायन करना पड़ रहा है, उन्होंने यह भी कहा है की पूंजी नहीं होने के कारण अब कुछ ही घरों में इस उद्योग को जिंदा रखा गया है ।वही मवेशी घंटी बनाने वाले निरंजन पोद्दार कहते हैं कि यहां मवेशी घंटी का निर्माण तीन पीढ़ियों से होता आ रहा है ,उन्होंने बताया कि सरकार कई बार घोषणा करती है कि उन्हें मदद दी जाएगी लेकिन कोई मदद नहीं मिलती है ,उन्होंने कहा कि मुद्रा लोन के तहत बैंक अगर दो लाख का लोन दे तो इस उद्योग को और बढ़ा सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह रोजगार बिहार के तीन ही जिलों में हो रहा है जिसमें कटिहार, गया और लखीसराय शामिल है ।उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि बिहार में लगभग एक करोड़ मवेशी का अनुमान है और पूरे भारत का अनुमान लगाया जाए तो लगभग 30 से 35 करोड़ मवेशी होंगे उन्होंने कहा है कि अगर इस उद्योग को बढ़ावा मिले तो अच्छी जिंदगी दी जा सकती है।
कहां कहां जाती है यहां की मवेशी घंटी
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मवेशी घंटी निर्माण करने वाले कारीगर कहते हैं कि यहां बनने वाली मवेशी बिहार के हर जिले के साथ-साथ दिल्ली, पटना ,पंजाब ,हरियाणा सहित विदेश नेपाल तक भेजी जाती है। लेकिन अब सरकारी मदद नहीं मिल रही है ,जिससे वो लोग स्थानीय बाजार तक ही इस मवेशी घंटी को भेज पाते हैं और किसी तरह से अपने रोजगार को जिंदा रखे हुए हैं।
मामले पर क्या कहते हैं बैंक के अधिकारी
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वह इस मामले पर अग्रणी बैंक जिला प्रबंधक कहते हैं कि छोटे-छोटे उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जीविका के माध्यम से लोन उपलब्ध कराई जाती है, और उनके आंकड़े बताते हैं कि इसका लाभ कई कुटीर उद्योग को भी मिला है ,ऐसे में मवेशी घंटी का भी कारोबार करने वाले जो कारीगर हैं उनसे मिलेंगे तो उन्हें अवश्य मदद दी जाएगी ।

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